Thursday, June 23, 2011

"यात्रा वृत"


आजकल कानपुर की तपती गर्मी से दूर बैंगलुरू में अच्छे मौसम का आनंद ले रहा हूँ. पिछले दिनों की ऐसी ढेर सारी बातें हैं जो आप सब तक पहुंचानी है. असमंजस की स्थिति में हूँ की कहा से शुरू करूँ और कहा तक करूँ. सब कुछ लिखना शुरू करूँ तो पोस्ट बहुत लम्बी हो जाएगी और यदि नहीं लिखा तो ऐसा लगेगा की ये तो बताया ही नहीं.चलिए संक्षेप में सब कुछ बताते चलता हूँ.
इस बीच  जैसे ही परीक्षाएं ख़त्म हुईं ट्रेनिंग के लिए बैंगलोर आने की तैयारियां शुरू हो गईं. इलेक्ट्रोनिक तथा रडार अनुसन्धान संस्थान, LRDE (DRDO) में ट्रेनिंग के लिए कॉल लेटर पहले ही आ चुका था. संस्थान के सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए पुलिस क्लियरेंस सर्टिफिकेट की मांग की गई थी. और फिर इसे बनवाने के दौरान पुलिस महकमे की सच को नजदीक से जानने का मौका मिला,जिससे की येन केन प्रकारेण आप सब वाकिफ ही होंगे. लेकिन आपको यह तो बताता ही चलूँ की अबतक के जीवन में पहली बार सुविधा शुल्क देते हुए कुछ अजीब सा लगा. लेकिन इसके आलावा मेरे पास कुछ विकल्प भी नहीं था. आपको यह भी बताता चलूँ की उचित जगह पे उचित सुविधा शुल्क नहीं देने की वजह से मेरे एक साथी का सर्टिफिकेट अब तक नहीं बन पाया है. हालाँकि वो तो जल्द ही इसे जमा करने की अर्जी देकर हमलोगों के साथ ट्रेनिंग करने आ गया है परन्तु पिताजी प्रतिदिन दफ्तर में उपस्थिति दर्ज करते हैं.पूछे जाने पर एक सीधा सा उत्तर ये मिलता है कि... 
-आज तो साहब बैठे ही नहीं या फिर आज बहुत काम था इसलिए हो नहीं पाया.
 खैर यात्रा के अन्य पहलुओं पर भी नजर डालते हैं. मेरे साथ एक और नई बात ये थी कि पहली बार इतने लम्बे सफ़र पे निकला था. इसके लिए उत्सुकता भी बहुत दिनों से थी और यात्रा मजेदार भी रही. विभिन्न स्टेशनों पे उतरना फोटोग्राफ्स लेना और फिर यहाँ मिलने वाले  अलग-अलग भाषाओँ  को जानने वाले लोगों के साथ बातचित करने की कोशिश सबकुछ अविस्मर्णीय रहा. इस दौरान की कुछ फोटोग्राफ्स भी पोस्ट कर रहा हूँ आप खुद ही देख लीजिये. बैंगलुरू स्टेशन पर पहुँचने के बाद पता चला की हमे यहाँ आने के बाद जिनसे मिलना था वो तो घर पे हैं. फिर तो हम चारो ( मै पवन, यश, आयुष और राकेश जिसे की हम लोगों ने नामों के पहले अक्षरों  को मिलाकर ग्रुप प्यार नाम दे रखा है)  हिंदी भाषियों के लिए यहाँ के बारे में जानने और समझने के लिए थोड़ी बहुत अंग्रेजी बोलना आना ही एक मात्र साधन समझ आया. और फिर  स्टेशन से बाहर निकलने के बाद टैक्सी   चालको ने अपने बातचीत से इस बात की पुष्टि भी कर दी. 

                                                                        पिछले एक सप्ताह में यहाँ के बारे में बहुत कुछ जानने और समझने का मौका मिला. यहाँ पहुँचने वाले दिन पूरे दिन की दौड़ भाग के बाद संस्थान में अपनी उपस्थिति दर्ज कराया,रहने के लिए पेइंग गेस्ट की खोज की और फिर अपनी आवश्यकता के कुछ स्थानों के बारे में जानकारी एकत्रित किया. इन सबमे " ग्रुप प्यार " का सम्मिलित प्रयास रहा. ३६ घंटे की यात्रा और फिर पूरे दिन के भाग दौड़ के बाद हम लोग अब एक दूसरे से बात चीत करने के मूड में भी नहीं थे. शाम को लगभग ८ बजे सोने के बाद हम लोग सुबह ८ बजे तक जगने की स्थिति में आ सके. फिर DRDO में शनिवार और रविवार की छुट्टी ने यहाँ के बारे में जानने और समझने का अच्छा अवसर दे दिया. अल्सुर लेक, शिव मंदिर, नेशनल पार्क, चिन्नास्वामी स्टेडियम, आई,आई.एम बैंगलुरू और फिर आते जाते रास्ते में मिलने वाले विभिन्न स्थानों को देखा और फोटोग्राफ्स लिए. कुछ फोटोग्राफ्स तो आज पोस्ट कर रहा हूँ और कुछ को अगली पोस्ट में स्थान दूंगा. 
कानपुर की गर्मी से दूर यहाँ का सदा एक सा बना रहने वाला तापमान यहाँ सबसे अच्छा लगा. साथ ही सफाई और पेड़ पौधों से सजा हरा-भरा शहर सुखद अनुभूति दे रहा है. आजकल आसमान में उमड़ते-घुमड़ते बादल प्रतिदिन थोड़ी वर्षा कर जाते है जो कि यहाँ के वातावरण को कुछ और ही खुशनुमा बना जाते हैं. आते जाते यह बात समझ आ गई है कि हिन्दी आते हुए भी कन्नड़ बोलना यहाँ के टैक्सी चालकों का पैसा बनाने का एक तरीका है. और यही वजह है की हम लोग अब टैक्सी करने से परहेज करने लगे हैं. करते भी हैं तो ऐसी जगह की जहाँ की दूरी और किराए की पूरी जानकारी है. यह सच है कि यहाँ कन्नड़ बोलने वाले बहुसंख्यक हैं परन्तु हिन्दी बोलने और समझने वालों की कमी भी नहीं है.अब सुबह ८.३० से शाम ४.३० तक के ट्रेनिंग के बाद ब्लॉगिंग के लिए अच्छा खासा समय मिल जाया करेगा. अतः शेष बातें अगली पोस्टों के माध्यम से पहुँचाता रहूँगा. आज के लिए बस इतना ही....



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धन्यवाद" 

3 comments:

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

खूब मजे करो। बधाई और शुभकामनाएँ।
बहुत अच्छी पोस्ट है।

किंतु भाषा की शुद्धता बहुत जरूरी है। इन शब्दों की वर्तनी सुधार लो :
चूका - चुका
सीधा सा उतर - उत्तर
पहलूवों - पहलुओं
बातचित - बातचीत
अविश्मरणीय - अविस्मरणीय
बैंगलोर - बंगलुरू
चालको - चालकों
पूरे दिन के भाग दौड़-पूरे दिन की भाग दौड़
बैंगलूर - बंगलुरू
कानपूर - कानपुर
जो की - जो कि
लगे है. करते भी है - लगे हैं. करते भी हैं
जहाँ के दूरी - जहाँ की दूरी
ब्लोगिंग - ब्लॉगिंग

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